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छोड़ दी वो गलियाँ,खिलती थीँ जहाँ कभी फूलोँ की कलियाँ,छोड़ दी वो गलिँयाँ...जिस आँगन मेँ गूँजती थी वो बच्पन की किल्कारियाँ,सूने पतझड़ के बाद जहाँ खिलता था बसंत,जहाँ आती थी सौँधी मिट्टी की महक,जहाँ सुनाई...
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no charms
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March 20, 2008 12:33:28 AM
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